संयुक्त राष्ट्र के मौसम विज्ञान संस्थान की एक ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि वातावरण में तापमान बढ़ाने वाली ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़कर एक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस चलन में कमी आने के कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं. इसी कारण से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, महासागरों का अम्लीकरण हो रहा है और मौसम का मिज़ाज प्रतिकूल हो रहा है.

इस विषय पर विश्व मौसम विज्ञान संस्थान (डब्ल्यूएमओ) के महासचिव पेटरी तालस ने कहा, “विज्ञान स्पष्ट रूप से सब कुछ बता रहा है. अगर कार्बन डाय ऑक्साइड और दूसरी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती नहीं की जाएगी तो पृथ्वी पर मौजूद जीवन पर जलवायु परिवर्तन का असर ख़तरनाक और अपरिवर्तनीय होगा. हमारे लिए पहल करने का मौक़ा लगभग समाप्त हो चुका है.”

मौसम विज्ञान संस्थान का ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन प्रदर्शित करता है कि कार्बन डाय ऑक्साइड (सीओ 2), मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का विश्वव्यापी संकेंद्रण पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है. इसके अतिरिक्त रिपोर्ट यह भी कहती है कि शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस और ओज़ोन परत को नष्ट करने वाला पदार्थ सीएफसी-11 दोबारा उत्सर्जित हो रहा है. इसे ओज़ोन परत को सुरक्षित रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि के ज़रिए विनियमित किया गया है.

संस्थान का ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन ख़ासतौर से ग्रीनहाउस गैसों के संकेंद्रण पर आधारित है जोकि उत्सर्जन और अवशोषण की जटिल प्रक्रियाओं के कारण वातावरण में मौजूद हैं.

जलवायु पर विभिन्न ग्रीनहाउस गैसों के असर में 1990 से 41 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जिसे ‘रेडियोएक्टिव फोर्सिंग’ कहा जाता है. रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में रेडियोएक्टिव फोर्सिंग में 82 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी सीओ-2 के कारण हुई है.

पेटरी तालस ने कहा, “पृथ्वी में सीओ-2 का इतना संकेंद्रण इससे पहले तीस से चालीस लाख वर्ष पहले हुआ था जब तापमान दो से तीन डिग्री अधिक गर्म था और समुद्र का स्तर अब से 10 से 20 मीटर ऊंचा था.”

ग्लोबल वॉर्मिंग पर अंतरसरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) ने अक्तूबर में विशेष रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में मौसम विज्ञान संस्तान की रिपोर्ट ने सर्वाधिक साक्ष्य प्रस्तुत किए थे. आईपीसीसी की रिपोर्ट ने यह चेतावनी दी थी कि इस शताब्दी के मध्य तक सीओ 2 का उत्सर्जन ख़त्म करना होगा तभी तापमान वृद्धि को 1.5  डिग्री के स्तर से नीचे रखा जा सकता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि तापमान को डिग्री के स्तर से नीचे रखने से हमारे ग्रह और उसके निवासियों पर मंडराने वाला ख़तरा कम हो सकता है.

मौसम विज्ञान संस्थान की उप महासचिव इलेना मनाएनकोवा ने इस अवसर पर कहा, “वातावरण में सीओ 2 सैकड़ों वर्षों तक और महासागरों में उससे भी अधिक समय तक मौजूद रहती है. इसलिए वातावरण से अतिरिक्त सीओ 2 को हटाने के लिए हम किसी जादू की छड़ी का इस्तेमाल नहीं कर सकते. ग्लोबल वॉर्मिंग का एक छोटा सा अंश भी बहुत मायने रखता है और इसीलिए लाखों-लाख ग्रीनहाउस गैसों का एक छोटा सा हिस्सा भी.”

कोप 24

पोलैंड में 2 से 14 दिसंबर के बीच संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन- कोप 24 का आयोजन होने वाला है. यह रिपोर्ट इस सम्मेलन में ऐसे वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करेगी जो नीति निर्माताओं को नए लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करेंगे. इस सम्मेलन का लक्ष्य 2015 के पेरिस समझौते के मद्देनजर एक कार्यान्वयन नीति अपनाना है.

इस रिपोर्ट के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैशलेट ने सभी देशों को एक पत्र लिखकर कहा है कि वे सभी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के तहत जलवायु परिवर्तन को रोकने और उसके प्रभावों को कम करने के लिए बाध्य हैं.

उन्होंने कहा, “इस प्राकृतिक ताक़त से मानवाधिकार को ख़तरा है जोकि इस पृथ्वी पर जीवन के सभी आधारों को चुनौती दे रही है.” मिशेल बैशलेट ने इंगित किया कि कोप 24 में लिए गए फैसले पेरिस संधि के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन संबंधी पहल को ‘अनिश्चित काल के लिए’ परिचालित करेंगे और यह भी कि “जलवायु परिवर्तन ने लाखों लोगों के जीवन के अधिकारों को प्रभावित किया है.”

विभिन्न कारणों से ग्रीनहाउस गैसों के स्तर में जो बदलाव होते हैं उन पर निगरानी रखने के बाद मौसम विज्ञान संस्थान के बुलेटिन में विश्वव्यापी औसत को पेश किया गया है. इन कारणों में औद्योगीकरण, जीवश्म ईंधन का प्रयोग, खेती करने की पद्धतियों में परिवर्तन, भूमि का अधिक से अधिक इस्तेमाल और वनों की कटाई शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए तत्काल पहल करने का आह्वान करता है.