विश्व की जनसंख्या में वर्ष 2050 तक 2 अरब 20 करोड़ आबादी और जुड़ जाएगी. संयुक्त राष्ट्र ने बुधवार को कहा कि इसमें से आधी से अधिक जनसंख्या यानी क़रीब 1अरब 30 करोड़ सब सहारा अफ्रीका में बढ़ने की उम्मीद है जहां स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच बहुत सीमित है, साथ ही उन्हें ‘बड़े पैमाने पर लैंगिक भेदभाव’ का भी सामना करना पड़ता है.

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की निदेशक मोनिका फेरो ने कहा कि विश्व स्तर पर लोग छोटे परिवार पसंद कर रहे हैं. यानी अधिक से अधिक लोग यह चुन रहे हैं कि उन्हें कितने बच्चे चाहिए या वे कितने बच्चों का लालन-पालन आसानी से कर सकते हैं.

मोनिका फेरो ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि निम्न प्रजनन दर की शुरूआत की शुरुआत यूरोप में 19 वीं शताब्दी के अंत में हुई थी और इतना समय बीत जाने के बाद भी कोई देश यह दावा नहीं कर सकता कि उसके सभी नागरिकों को प्रजनन अधिकार प्राप्त हैं.

उन्होंने कहा, ‘किसी देश की प्रजनन दर चाहे अधिक हो या कम, दोनों ही तरह के स्थानों पर आपको ऐसे लोग और जोड़े मिलेंगे जो कहेंगे कि वे अपने बच्चों की कुल संख्या तय नही कर सकते. उनके या तो बहुत अधिक बच्चे होते हैं या बहुत कम.’

43 देशों में महिलाओं के चार से अधिक बच्चे होते हैं

यूएनएफपीए की रिपोर्ट स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन 2018 के अनुसार, ऐसे 43 देश हैं जहां महिलाओं के चार या उससे अधिक बच्चे होते हैं, और इनमें से 38 देश अफ्रीका में हैं.

पूर्वी अफ्रीका में सिर्फ़ पाँच देशों के अलावा बाक़ी सभी देशें में कराए गए सर्वेक्षण में जितनी महिलाओं से बातचीत की गई उनमें से आधी से कुछ कम महिलाओं ने कहा कि उन्हें अगर चुनने का मौक़ा मिले तो वो और अधिक बच्चे नहीं चाहतीं.

अगर यूएनएफपीए के अनुमान सही है निकला तो विश्व जनसंख्या में अफ्रीका की हिस्सेदारी 2017 की 17 प्रतिशत से बढ़कर 2050 में 26 प्रतिशत हो जाएगी.

रिपोर्ट कहती है, अफ्रीकी महाद्वीप के देशों की ही बात करें तो आमतौर पर शहरों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में ‘प्रजनन दर’ उल्लेखनीय रूप से कम है. उदाहरण के लिए इथियोपिया के शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के लगभग 2.1 बच्चे होते हैं, जबकि देश के बाक़ी हिस्सों में लगभग पांच बच्चे.

संघर्ष का शिकार क्षेत्रों में होते हैं बड़े परिवार

संघर्ष और असुरक्षा के बड़े परिवारों से सम्बन्ध की तरफ़ ध्यान दिलाते हुए रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर में औसत प्रजनन दर प्रति महिला 2.5 बच्चे है जबकि अफग़ानिस्तान, ईराक़, फ़लस्तीन, तिमोर-लेस्ते और यमन में प्रजनन दर इससे कहीं ज़्यादा है.

A woman walks with her child in Niger. 2018.

यूएनएफपीए अधिकारी मोनिका फेरो ने सभी देशों से आग्रह किया कि वे ऐसी नीतियां और कार्यक्रम लागू करें जिनके ज़रिए लोगों को ‘प्रजनन संबंधी ज़्यादा विकल्प’ मिल सकें.

मोनिका फेरो ने कहा, ‘विकासशील देशों में 67 करोड़ 10 लाख महिलाओं ने परिवार नियोजन के आधुनिक साधनों को चुना है. लेकिन हम जानते हैं कि उसी दौरान विकासशील देशों की 25 करोड़ महिलाएं अपने प्रजनन अधिकार पर अपना नियंत्रण चाहती हैं पर उन्हें परिवार नियोजन के आधुनिक साधन और विकल्प उपलब्ध नहीं हैं.’

संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार, सभी को उत्तम दर्जे की मातृत्व स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है. रिपोर्ट ने परिवार नियोजन के आधुनिक साधनों की उपलब्धता, बेहतर यौन शिक्षा और महिलाओं के प्रति पुरुषों के रूढ़िवादी रवैये में बदलाव पर ज़ोर दिया.

मोनिका फेरो ने कहा, जो दम्पत्ति अधिक बच्चे चाहते हैं, उनकी भी मदद की जानी चाहिए. अगर आर्थिक कारणों से वे ऐसा नहीं कर पाते तो इस समस्या को भी बेहतर तरीके से हल किया जा सकता है, मिसाल के तौर पर – बच्चों की देखभाल के ख़र्च को वहन करने योग्य बनाकर.

उन्होंने कहा, हाल के दशकों में फ्रांस और नार्वे में ऐसे क़दम उठाने से जन्म दर में सुधार हुआ है.

इसके बावजूद बहुत से विकासशील देशों में संसाधनों या राजनैतिक सुरक्षा की कमी है जोकि सभी नागरिकों के प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकारों में सुधार के लिए ज़रूरी है.

मोनिका फेरो ने कहा, वो देश ‘लगातार संघर्ष कर रहे हैं कि उनके नागरिकों की शिक्षा, रोज़गार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरतें पूरी हो सकें. रिपोर्ट में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि इन देशों में परिवार नियोजन की मांग बहुत अधिक है जो पूरी नहीं हो रही.’

प्रजनन अधिकारों में काफी सुधार आया है

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की निदेशक मोनिका फेरो ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या एवं विकास सम्मेलन को 179 देशों द्वारा मंजूरी मिलने के क़रीब 25 वर्षों के दौरान की अवधि में विश्व भर में लोगों के प्रजनन अधिकारों में ‘काफी सुधार’ आया है.

उनके अनुसार, अधिकतर देश मानते हैं कि लोगों के लिए बच्चों की संख्या, उनके जन्म के समय और दो बच्चों के बीच के अंतर को तय करना जरूरी है. यह फैसला किसी भेदभाव, दबाव या हिंसा से मुक्त होना चाहिए.

इसी प्रकार की प्रतिबद्धता टिकाऊ विकास लक्ष्यों की कार्यसूची में भी प्रदर्शित होती है जिस पर 2015 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सहमति जताई थी.

यूएनएफपीए अधिकारी मोनिका फेरो का कहना था कि इसके बावजूद इस योजना को लागू नहीं करने के कारण लाखों महिलाओं को तकलीफ़ें उठानी पड़ रही हैं.

‘प्रत्येक वर्ष गर्भावस्था या प्रसव के दौरान क़रीब तीन लाख महिलाएं मौत का शिकार हो जाती हैं क्योंकि उन्हें समय पर मातृत्व स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिल पाती हैं. हर दिन हजारों लड़कियों की बचपन में, या बहुत कम उम्र में शादी कर दी जाती है, और बहुत सी लड़कियों को ख़तना (फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन) का शिकार होना पड़ता है, क्योंकि उनके पास इन रास्तों से बचने कोई विकल्प नहीं होता.’