अगर सीधे या आसान शब्दों में कहें तो कहा जाएगा कि दुनिया भर में हर पाँच सेकंड में एक बच्चे की मौत ऐसे कारणों या बीमारियों से हो जाती है जिन्हें रोका जा सकता है. बेशक ये बहुत परेशान करने वाली बात हो सकती है, मगर एक ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि पिछले वर्ष 15 वर्ष से कम उम्र के क़रीब 63 लाख बच्चों की मौत ऐसे ही कारणों से हो गई.

संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों ने ये रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट का नाम है – Newborn babies account for half of the deaths. इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़, विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग और विश्व बैंक ने सोमवार को जारी किया.

यूनीसेफ़ के Research Director यानी शोध निदेशक लॉरेंस चैन्डी का कहना था कि एक तसल्ली की बात ये है कि रोके जा सकने वाले कारणों और बीमारियों से बच्चों की मौतें रोकने के प्रयासों में बड़ी कामयाबी पिछले क़रीब 25 वर्षों के दौरान हासिल हुई थी.

1990 के बाद से इन मौतों में की संख्या क़रीब आधी हो गई है. लेकिन अब भी लाखों बच्चों की मौत इसलिए हो जाती है कि वो कौन हैं और उनका जन्म कहाँ हुआ है.

सब सहारा अफ्रीका क्षेत्र के देशों में रहने वाले बच्चे बड़े पैमाने पर प्रभावित होते हैं. दुनिया भर में पाँच वर्ष से कम उम्र के जितने बच्चों की मौत होती है, उनकी आधी संख्या सब सहारा अफ्रीका क्षेत्र के देशों में होते हैं. कुल संख्या का क़रीब एक तिहाई हिस्सा दक्षिण एशियाई देशों में बसता है.

लॉरेन्स चैन्डी का कहना था कि अगर यही चलन जारी रहा और तुरन्त ठोस उपाय नहीं किए गए तो अब से लेकर 2030 तक पाँच साल से कम उम्र क़रीब पाँच करोड़ 60 लाख नौनिहालों की मौत हो जाएगी. उनमें से क़रीब आधी संख्या नवजात शिशुओं की होगी.

लेकिन थोड़ी सावधानी बरतें और कोई बीमारी होने पर समय पर असरदार दवाई उपलब्ध कराने, स्वच्छ पानी के इस्तेमाल, बिजली आपूर्ति और Vaccine यानी बीमारियाँ रोकने वाले टीके समय पर लगवाने से इनमें से हर एक बच्चे के हालात बदलने में बड़ी कामयाबी मिल सकती है.

पाँच साल से कम उम्र के ज़्यादातर बच्चों की मौतें न्यूमनिया, मलेरिया और जन्म के समय होने वाली जटिलताओं से होती हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि इन्हें या तो होने से रोका जा सकता है या बीमारियाँ हो जाने पर उनका प्रभावशाली इलाज किया जा सकता है.

पाँच से 15 साल की उम्र के बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण उनका किसी घटना में घायल होना बताया गया है. इनमें ज़्यादातर मौतें सड़क दुर्घटनाओं या पानी में डूबने से होती हैं.

ये मामला इतना गम्भीर है कि देशों के भीतर भी बहुत बड़े अन्तर, भिन्नताएँ और असमानताएँ पाई जाती हैं. अनेक देशों में पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत की दर शहरी इलाक़ों की तुलना में ग्रामीण इलाक़ों में 50 फ़ीसदी तक ज़्यादा होती है. इसके अलावा शिक्षा इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

अशिक्षित महिलाओं के बच्चों की पाँच साल से कम उम्र में ही मौत हो जाने की सम्भावना, उन महिलाओं के बच्चों के मुक़ाबले दोगुनी ज़्यादा होती है जो सेकंडरी या उच्च शिक्षा हासिल किए हुए होती हैं.

विश्व बैंक में स्वास्थ्य, पोषण और जनसंख्या मामलों के वरिष्ठ निदेशक टिम इवान्स का कहना था कि होने से रोकी जा सकने वाली बीमारियों की वजह से इन मौतों को रोकने और बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में और ज़्यादा धन ख़र्च करने से देशों की Human Capital यानी मानव सम्पदा मज़बूत होती है.

ये स्वस्थ मानव सम्पदा किसी भी देश की प्रगति, समृद्धि, ख़ुशहाली और अच्छा भविष्य बनाने में सक्षम होती है.

@संयुक्त राष्ट्र समाचार